गया में पिंडदान क्यों किया जाता है जाने पौराणिक कथा
छत्तीसगढ़ 24 न्यूज़ धर्मेंद्र कुमार पांडे सीपत बिलासपुर 
पितृ पक्ष की अवधि 16 दिनों तक चलती है। लेकिन इस बार 15 दिन का है इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की उपासना कर पिंडदान करते हैं। देव नगरी गया में पिंडदान किया जाता है। क्या आपको पता है कि गया में ही क्यों किया जाता है पिंडदान अगर नहीं पता, तो आइए जानते हैं इसके पीछे की वजह और इसकी शुरुआत कैसे हुई?
पौराणिक कथा के अनुसार, गयासुर नाम का एक असुर था। वह श्रीहरि की भक्ति बहुत करता था। उसने अपनी भक्ति के द्वारा भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और सभी देवी-देवताओं से बहुत पवित्र होने का वरदान प्राप्त किया। माना जाता है कि प्राचीन समय में गयासुर के दर्शन करने से जातक को सभी पापों से मुक्ति मिलती थी। उसे मरने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती थी। इससे स्वर्ग में अव्यवस्था फैल गई। ऐसा देख सभी देवी-देवता चिंतित होने लगे। इस स्थिति में देवी-देवताओं ने गयासुर से किसी पवित्र जगह पर यज्ञ करने की इच्छा जाहिर की।
इस बात को सुनकर गयासुर गया जी में भूमि पर लेट गए और इसी जगह पर देवी-देवताओं ने गयासुर के शरीर पर विधिपूर्वक यज्ञ किया। यज्ञ के दौरान गयासुर का शरीर स्थिर रहा। ऐसा देख सभी देवता श्रीहरि के पास पहुंचे। गयासुर की भक्ति से मुक्ति दिलाने की इच्छा जताई।
तभी विष्णु जी गयासुर के शरीर पर विराजमान हो गए। इस दौरान प्रभु ने गयासुर से वर मांगने के लिए कहा। गयासुर ने बोला कि आप अनंत काल तक इस स्थान पर विराजमान रहें। इस बात को सुनकर प्रभु उसके भाव में डूब गए और गयासुर का शरीर पत्थर में बदल हो गया।
तब श्रीहरि ने कहा कि जो जातक अपने जीवनकाल के दौरान सच्चे मन से गया में अपने पितरों का पिंडदान करेगा। उसके मृत पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने फल्गु नदी पर अपने पिता जी का पिंडदान किया था। तभी गया में पितरों का पिंडदान किया जाता है।
आइये जानते हैं पितृ पक्ष में किये जाने वाले उपाय
1. पहला उपाय : परिवार के सभी सदस्यों से बराबर
मात्रा में सिक्के इकट्ठे करके उन्हें मंदिर में दान करें। मतलब यह कि यदि आप अपनी जेब से 10 का सिक्का ले रहे हैं तो घर के अन्य सभी सदस्यों से भी 10-10 के सिक्के एकत्रित करने उसे मंदिर में दान कर दें। यदि आपके दादाजी हैं तो उनके साथ जाकर दान करें। यह दान गुरुवार को करें
2. दूसरा उपाय : 16 दिनों तक लगातार कौए,
चिढ़िया, कुत्ते और गाय को रोटी खिलाते रहना चाहिए। उक्त चारों में से जो भी समय पर मिल जाए उसे रोटी खिलाते रहें।
3. तीसरा उपाय : 16 दिनों तक लगातार सुबह और
शाम घर में संध्यावंदन के समय कर्पूर जलाएं और गुड़ में घी मिलाकर उसकी धूप दें।
4. चौथा उपाय : पीपल या बरगद के वृक्ष में जल
चढ़ाते रहना चाहिए। केसर का तिलक लगाते रहना चाहिए। विष्णु भगवान के मंत्र जाप, श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करने से पितृदोष चला जाता है। एकादशी के व्रत रखना चाहिए कठोरता के साथ।
5. पांचवां उपाय : पितृ पक्ष में प्रतिदिन नियमित रूप
से पवित्र नदी में स्नान करके पितरों के नाम पर तर्पण करना चाहिए। इसके लिए पितरों को जौ, काला तिल और एक लाल फूल डालकर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके जल अर्पित करना चाहिए। पितरों के लिए किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध तथा तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं।
6. छठवां उपाय : पितृ पक्ष के दौरान पिंडदान भी
किया जाता है। पितृ पक्ष में पिंडदान का भी महत्व है। सामान्य विधि के अनुसार पिंडदान में चावल, गाय का दूध, घी, गुड़ और शहद को मिलाकर पिंड बनाए जाते हैं और उन्हें पितरों को अर्पित किया जाता है। यह पिंडदान भी कुछ प्रकार का होता है। धार्मिक मान्यता है कि चावल से बने पिंड से पितर लंबे समय तक संतुष्ट रहते हैं।
7. सातवां उपाय : श्राद्ध में पंचबलि कर्म किया जाता
है। अर्थात पांच जीवों को भोजन दिया जाता है। बलि का अर्थ बलि देने नहीं बल्कि भोजन कराना भी होता है। श्राद्ध में गोबलि, श्वान बलि, काकबलि, देवादिबलि और पिपलिकादि कर्म किया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान कोओं को प्रतिदिन खाना डालना चाहिए। मान्यता है कि हमारे पूर्वज कौवों के रूप में धरती पर आते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मण भोज कराएं


